सभी खतों का सही जवाब नहीं मिलता,
हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।
बदनसीबी भी अक्सर आड़े आ जाती है,
शायद इसलिए हरेक को मकान नहीं मिलता।
कोई मिले तो उससे उसका हाल पुछूं,
मगर करिब का उसके कोई इंसां नहीं मिलता।
बेदिली ही शायद उसकी दरियादिली है,
जो होंठों पे हँसी तो है दिल में निशां नहीं मिलता।
आज होश ओ हवास में हूं कह रहा हूं,
जख्म देने वाले तो बहुत मेहरबां नहीं मिलता।
अब किसे ढुंढे और किसे याद करे अनुराग,
छते तो मिलती है मगर मकां नहीं मिलता।
©anuragrahi
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