S

ख़त फकत कलम से नहीं लिखें जाते।

ख़त फकत कलम से नहीं लिखें जाते।

अभी कुछ और जीने दे

ग़मों के घूंट कुछ और पिने दे

औरों के लिए जी है जिंदगी

अब कुछ अपने लिए जिने दे

दर्द लिफाफे में नहीं आते

दर्द मुक्तसर कुछ और होने दें

दिल का रिश्ता बनता ही नहीं

किसी एक से रिश्ता-ए-दिल होने दें

वो तुफां है झोपड़ीयां उजारता है

मैं रूह-ए-फ़क़ीर हूं रोने दे

ख़त फ़कत कलम से नहीं लिखें जाते

ज़ेहन में किसी का ख्याल आने दे