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खुद से मन को समझाना है

खुद से मन को समझाना है
लुट गया उर संसार देखो
मुख पर नहीं है हार देखो
फिर भी क्यों उजड़ी छटा  का  बुनता तू ताना-बाना है
खुद से मन को समझाना है
झड़ उठी कोपों की लाली
भर उठी चिठ्ठीयां सवाली
एक रजनी बैठ इनको भी उर दीपों में सुलगाना है
खुद से मन को समझाना है
तम  समाधि  ले  चुका है
तन क्षुब्धा सब से चुका है
इस बिस्तर पर एकाकीपन ले संग सबको दफनाना है
खुद से मन को समझाना है
है  टूटा  शीशमहल  जर्जर
लाखों इच्छा चुभती तन पर
इस मृगतृष्णित खंडहर का भी तो पिंडदान कराना है
खुद से मन को समझाना है..
-अमन वर्मा "अमन"
©amnakku