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" खुशी"....

भीतर की खुशी ढूंढने कहां जाए जा रहा है....
यह कायनात हर लमहे में उसे तेरे लिए बिछाये जा रहा है.....
सागर की लहरों से क्यों दूर जाए जा रहा है उसे महसूस कर लहरो का समूह तेरे भीतर खुशी का आलम सजाए जा रहा है......
पेड़ तेरे लिए सजे आलम में स्वागत के लिए पत्तों का बंदनवार बनाए जा रहा है....
पुष्पों की कलियों का समूह तेरे खुशियों के महल को महकाए जा रहा है.....
पत्थर तुझे उस मार्ग में दृढ़ता से आगे बढ़ाए जा रहा हैं पक्षियों का समूह तेरे लिए नई धुन बनाया जा रहा है...
हवाओ की तरंग तेरे लिए सूखे पत्तों का आसन लगाए जा रहा है....
चमकता हुआ सूरज तेरे महल को रोशन किए जा रहा है
फिर तू क्यों इस संसार में डूबे जा रहा है ,जब इतना प्यारा संसार तुझे पुकारे जा रहा है ....
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