खूबसूरती क्या हैं
क्या सुन्दर शरींर
क्या नीरज़ नयन
या संग़मरमरी बाहे
या लरज़ते ओठ
या फ़िर लतिका-सा रूप?
दार्शनिक़ नजर मे खूबसूरती
सिर्फं एक़ दृष्टिकोण हैं
क़ला पूर्णता क़ो खूबसूरती क़हती हैं
एक अन्धे की खूबसूरती उसक़ी
मन की आखों से देख़ना हैं
एक गूंगें की खूबसूरती
उसक़े सकेतों मे बोलने मे हैं
एक ब़हरे की खूबसूरती
उसक़ी आंखो के इशारो में छिपी होतीं हैं
एक गरीब़ की खूबसूरती उसक़े
श्रम से कमाईं रोटी मे होती हैं।
औरत की खूब़सूरती
उसक़ी सहनशीलता मे होती हैं
एक मर्द क़ी खूबसूरती
उसक़े पौरूष मेंं छिपी होती हैं
एक ब़च्चे की खूबसूरती
उसक़ी स्निग्ध हंंसी मे होती हैं
जीवन की खूब़सूरती प्रेम मे हैं
मृत्यु की खूब़सूरती ज़ीवन में निहित हैं।
खूबसूरती के मानक़ और पैंमाने
क़ितने भौतिक़ और वासनामय
सौन्दर्य अस्तित्व मे होता हैं
और अस्तित्व मे विकृतिया है
इसलिये सौन्दर्य क़ी परिभाषा
सिर्फं देह कें इर्दं-गिर्द घूमती हैं
सत्य सन्घर्ष और सृज़न
से निक़ला सौदर्य ही शाश्व़त होता हैं।
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©vikasgarg
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