जिस खूशी की तलाश में मैं निकला,
दुःख उतना ज्यादा मुझे मिला था।
कितना छिपाकर बैठा समुंदर अंदर,
बाहर की शिलाऔ में क्या रखा था।
नाखूश चहेरे के बदन में गहना हो तो,
मूल्य उनका कायम कम रहा था ।
हँसना उसका सोने मुँहर से भी महँगा,
"संकेत "ददँ आज तक न जान सका था।
डाँ. माला चुडासमा "संकेत "
©dr.mala
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