ख्वाब
कल रात मैंने एक ख़्वाब देखा,
ख़्वाब में तुझे अपने क़रीब देखा —
इतना क़रीब कि साँस और धड़कन के बीच
कोई फ़ासला बाकी ना रहा।
तेरी साँसें मेरी साँसों से उलझी थीं,
जैसे हवा भी हमें जुदा करना भूल गई हो,
हर गर्म आह मेरे होंठों को छूकर
दिल में कोई आग सी जगा गई हो।
तेरा जिस्म मेरे जिस्म से यूँ लगा था,
जैसे रात ने चाँद को बाँहों में भर लिया हो,
तेरी छुअन की धीमी लहरों ने
मेरी रूह तक सफ़र कर लिया हो।
तेरी आँखें मेरी आँखों के इतनी पास थीं,
कि दुनिया धुँधली पड़ती जा रही थी,
बस तेरी नज़र की गर्मी से
मेरी हर धड़कन तेज़ होती जा रही थी।
तेरे होंठ कुछ कहे बिना ठहरे थे,
पर ख़ामोशी भी शोर मचा रही थी,
हर अधूरी बात हमारी
साँसों की भाषा में ढलती जा रही थी।
तेरी धड़कन मेरे सीने से लगी,
तो लगा दिलों ने सरहदें तोड़ दीं,
दो अलग कहानियाँ थीं शायद,
पर उस पल किस्मत ने जोड़ दीं।
मेरी उँगलियाँ तेरी पीठ पर ठहरीं,
जैसे लफ़्ज़ कोई लिखना चाहती हों,
और तेरी नज़दीकियों की गर्मी में
मेरी सारी हिचकियाँ पिघलना चाहती हों।
तेरे सीने और मेरे दरमियाँ,
फ़ासला तिनके से भी कम था,
हर साँस में बस एक ही एहसास —
तू ही इश्क़, तू ही हम था।
वक़्त उस पल धीमा पड़ गया था,
रात हमारी धड़कनों में बस गई थी,
और मोहब्बत…
सिर्फ़ महसूस होने की हद तक रह गई थी।
फिर अचानक नींद टूटी —
कमरा ख़ामोश, साँसें तन्हा थीं,
पर बदन पर अब भी तेरी गर्माहट,
और दिल में अधूरी सी चाहत ज़िंदा थी।
अब हर रात उसी ख़्वाब का इंतज़ार रहता है,
जहाँ तू फिर करीब आए,
और मैं फिर उसी पल में खो जाऊँ —
जहाँ इश्क़ सिर्फ़ कहा नहीं,
पूरी रूह से महसूस किया जाए।
✍️Shivanya
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