मैं हमेशा, हरदम बीच हशिनों के रहता हूँ,
इसलिए कभी शेर तो कभी गजल बनाता हूँ।
हर घड़ी हर वक्त मिज़ाज एक सा नहीं रहता,
जो कभी दिलकश तो कभी गमगिन बनाता हूँ।
मेरे कूचे में ही है एक खुबसुरत दिलनशी,
जिसके लिए मैं ख्यालों का ताजमहल बनाता हूँ
वैसे तो मैं खुद से बेगैरत, बेशर्म, बदसूरत इनसां हूं,
मगर उसके लिए अपने लहजे को सरल बनाता हूँ।
मेरे सुखन में ज़िक्र उसके सीवा न औरों का मिलेगा,
मैं अपने अलफाजों से अब उसका चेहरा बनाता हूँ।
बड़ा बेरहम मौत के सौदागर है इस जमाने भी,
बचने को गोला बारूद सा कलम को हथियार बनाता हूँ।
तुझे ऐ ज़िन्दगी अब कैदखाने से गुजरना होगा,
इसलिए मैं तुझे दुख-दर्द का आदी बनाता हूँ।
©anuragrahi
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