बहुत अच्छा है मेरे ख्वाबों का शहर
या खुदा लग ना जाए किसी की नजर
कुछ बुन रहा,कुछ चुन रहा, कुछ हुए सच
महका रहा है आशियां मेरा रब शामों सहर
रौशनी भी है..बहारां भी...नजारे भी उम्दा
जगमगा रहा दूर तलक.....सुहाना है मंजर
चुरा नहीं सकता कोई मेरी आंखों से इसे
संभाल कर रखा है मैंने इसे आठों पहर
कोई भी हो मौसम मैं सजाता रहता हूं इसे
खौफ है कहीं झेल न पाए ये खुदा का कहर
ऐ हवा तू मतवाली हो चल..ऐ घटा जमकर बरस
और मेरी आंखों में हमेशा के लिए जाए ये ठहर
जमीं से फलक का फासला तय कर लूं चंद मिनटों में
या खुदा! आंखों से मेरे ख्वाब बिछड न जाए अगर
©abhidilse
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