गर शायद ये जिन्दगी
आज खत्म ही हो जाए,
पर तुकडों में बिखरी हैं ऐसी की,
समेंटने के लिए अब वक्तही नहीं मिलता।
न जाने और कितनों के,
एहसान चुकाने बाकी हैं,
और खोएँ हुएँ रिश्तों में,
पहचान के लिए वक्त नहीं मिलता।
की शायद कोई सरकार,
आधार कीं ओर जिन्दगी दे,
पर ना हो कोई परिवार,
की जिन्दगी भी दुशवार लगे।
इन्सानियत के वक्त से बोझ हैं बन गयी,
सुंदर थी कितनी मेरी ये जिन्दगी,
वक्त को यूँ समेंटना भी नहीं चाहते,
न जाने क्यूँ हैं ये "बोझ सी जिन्दगी..."
- निलेश इंगोले
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