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किस को तेरी दरकार नहीं है।

किस को तेरी दरकार नहीं है
बिन तेरे ये संसार नहीं है।
कदम कदम पे होती तेरी जरूरत
तू नहीं तो इंसां का सत्कार नहीं है।
जिस जिस के पास तुम घर कर गई हो
रास्ते में उसके कोई दिवार नहीं है
तुम्ही से तो है फकत इस जहां में रौनक
तेरे सिवा यहां किसी का किरदार नहीं है।
कभी आ जाओ मेरी नेमत-ए-जीस्त बनकर
मेरी जिंदगी भी उतना बेकार नहीं है।
जब चाहो तुम फिर चलीं जाना
मुझपर गर तुझे ऐतबार नहीं है।
सभी से गर है तेरा जन्मों का रिश्ता तो
ऐ पैसा,अनुराग तेरा क्यों हकदार नहीं है।
©anuragrahi