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किसी की उम्मीद

एक उम्मीद के खातीर मै खुद उम्मीद बनता रहा,
क्या कहूँ हाल-ए-दिल का सबब जिंदगी यूही कटता रहा।
ख्वाईशे मुझसे बहुत थी मेरे हमदम मेरे हमसफर को भी,
आज,कल, परसों, तरसों में बातें यूही टहलता रहा।
©anuragrahi