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किसी की यादें दिल से लगाएं बैठे हैं।

किसी की यादें दिल से लगाएं बैठे हैं।

किसी की यादें दिल से लगाएं बैठे हैं

अब भी सपने उसी की सजाएं बैठे हैं

उसने रकिब का मेरे सामने थाम लिया हाथ

हम अब भी उसे दिल में बसाए बैठे हैं

वो मिले तो पुछ लूं बेवफाई का सबब

न जाने कहां कहां मुझसे ख़ुद को छुपाएं बैठे हैं

न रहा चाहत तेरे दीद की न रहा अब आरज़ू कोई

अब सुख़न-ए-ग़म में खुद को भुलाए बैठे हैं

हर कोशिश इज़हार की हर तीर वो तेरे इन्कार की

पल पल ज़ख़्म-ए-जीगर अनुराग की बढ़ाएं बैठे हैं।