कल कल छल छल जैसे अविरल
बहता है नदियों का जल
गुजर जाता कुछ ऐसे ही जीवन सरिता का हर पल
बनकर कल आज और कल ।
हर आज बन जाता है बीतकर बीता हुआ वह कल
आने वाला कल भी बन जाता है आज ।
कोई न जान सका इस आज कल का राज
न जाने कैसा होगा वह आने वाला कल ।
खुशियों से भर लें जीवन का यह स्वर्णिम पल
कल किसने देखा
किसी ने नहीं देखा कल ।
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©vikasgarg
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