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कितना मुश्किल है छुपके छुपाके गुज़र जाना।

कितना मुश्किल है छुपके छुपाके गुज़र जाना
मेरे बस में नहीं मेरी जां अब संभल जाना।
जितनी बार देखा है उम्मीद से हमने तेरी तरफ
तेरी आंखें ब्यां करती है तेरा अब बदल जाना।
ये दिल बिते लम्हों को याद कर आहें भरता है
शर्मिली निगाहों से देखना मुझे और मचल जाना।
फाकाकश मेरे इस हालात पर कुछ तो रहम करो
लाज़मी है तेरे दिल का भी अब पिघल जाना।
किस तरह गुजारें बग़ैर तेरे शाम-ओ-सहर तन्हा
मत पुछों उन दिन और रातों का निकल जाना।
याद आती है तेरी अदा-ए-हुस्न का हर मंज़र
अनुराग सिखा लिया है इसी तरह अब बहल जाना।
©anuragrahi