कल रात एक ख़्वाब ने दिल को छू लिया,
एक हसीन मंजर ने रूह को रोशन कर दिया…
मैंने तुम्हें देखा एक महकते गुलशन के दरमियां,
जहाँ हर फूल जैसे तुम्हारी आमद का मुंतज़िर हो।
खड़ी थी तुम, फूलों के बीच यूँ नरम सी,
जैसे सुबह की पहली किरण ज़मीन पर उतर आई हो।
सफेद लिबास में लिपटी हुई एक पाक रौशनी,
चेहरे पर चमकती हुई वो मासूम मुस्कान,
जो चाँद को भी शरमा दे अपनी सादगी से।
काले, लंबे रेशमी बाल, हल्की हवा से खेलते हुए,
जैसे रात अपनी ज़ुल्फ़ों को धीरे से बिखरा रही हो।
कसम से… तुम किसी परी से कम न लग रही थी,
बल्कि परी भी तुमसे हुस्न उधार माँगे।
फिर देखा… तुम्हारे कंधे पर एक रंगीन तितली ठहरी हुई थी,
जैसे तुम्हारी खामोशी का राज़ सुन रही हो।
एक और तितली तुम्हारे बालों में उलझी हुई,
जैसे उन ज़ुल्फ़ों के जादू में खुद को खो बैठी हो।
और कई तितलियाँ तुम्हारे इर्द-गिर्द मँडरा रही थी,
जैसे अपनी मलिका का शान से इस्तक़बाल कर रही हो।
उस लम्हे में लगा…
ये गुलशन तितलियों का नहीं, तुम्हारा है,
और तुम ही उसकी रूह हो, उसकी असली पहचान।
तुम थी… और बस तुम ही थी,
बाकी सब सिर्फ तुम्हारी खूबसूरती का एहसास था…
एक ख़्वाब… जो हकीकत से भी ज़्यादा हसीन था।
✍️शिवन्या जैन
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