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कलम और दवात-3

अंधेरों में खुद को चांद तन्हा ना महसूस करने लगे,
शायद यही सोचकर करोड़ों सितारे भगवान ने,
आसमान की चादर में पिरो दिए,
जिस को भी हंसकर गम का दरिया,
पार ना करना आया,
तकदीर ने वे सारे के सारे,
भय के प्यालों में डुबो दिये,
मुकर रहा था कोई अपना ही,
चंद रुपयों की खातिर,
दी जब उसको उसकी इकलौती औलाद की कसम,
तो दिये,
हम तो शायर है,
नहीं जानते तेरा-मेरा अपना-पराया,
जिसने भी प्यार से करीब बैठाया,
सारी उम्र कर्जदार उसके हो दिये
🌹🌹🌹
©vicky