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कोई भला मुझपर एतबार क्यूँ करें ।

कोई भला मुझपर एतबार क्यूँ करें
इस मुफलिसी में कोई प्यार क्यूँ करें।
मेरे हबीब मेरे दोस्त ने डाल ली दरिचे पे चादर
वो भला मेरा अब इंतज़ार क्यूँ करें ।
मैने हद से ज्यादा ताउम्र रिश्तों को तवज्जो दी
गुस्ताखी दिल ने की फिर बर्दाश्त दिमाग क्यूँ करें।
फकत लिबास अब रह गई है बनके पहचान महफिलों की
मैं शायर हूं कोई इसका एहतराम क्यूँ करें।
कल फिर चांद निकलेगा कल फिर बात होगी
चलो सो जाए अब निन्द हराम क्यूँ करें।
©anuragrahi