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क्रोध

क्रोध की एक अपनी अलग अनुभूति है,
इस रस में सब बेरंग हो जाता है,
कभी कभी ये कुछ इस तरह से हावी हो जाता है,
हमारे सोचने की क्षमता को समाप्त कर देता है,
इस रस के सात अवसाद का वजूद भी बाद जाता है,
ये हमें कुछ यूं अपने गले लगाता है,
मन कहीं और गलती से भी विचरण नहीं कर पाता है,
अंत में परिणाम ठीक हमारे व्यवहार के विपरीत ही आता है,
पर ये क्रोध है...
इतनी आसानी से कहाँ अपनी जकड़ से हमें ये मुक्त कर पाता है।
©shaaya