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करूं न याद गर तो किस तरह भुलाऊं तुझे।

करूं न याद गर तो किस तरह भुलाऊं तुझे
ग़ज़ल के बहाने दिन-रात गुनगुनाऊं तुझे।
तेरी बदन खार खार है शाख-ए-गुलाब की तरह
मैं ज़ख्म ज़ख्म हूं फिर भी गले लगाऊं तुझे।
ये दुनिया कुछ अजीब निगाह से देखती है हमें
मैं उनसे कहां छुपाऊं कहां ले जाऊं तुझे।
तुम्हीं दौलत-ए-दिल हो तुम्हीं हो राहत-ए-जां
किसी के वास्ते आखिर क्यूं गवाऊं तुझे।
उन साथ साथ लम्हों के संयोए हुए अपने रिश्ते को
गिराकर बुंद बुंद अश्कों को याद दिलाऊं तुझे।
तुम हमसफ़र बनके भी सर-ए-मंजिल से भटक रही हो
ये अजब नहीं कि मैं अनुराग अब न याद आऊं तुझे।
©anuragrahi