आहिस्ता आहिस्ता चल रही थी जिंदगी
जाने कब रुख मोड़ लिया
भंवर के बीच खोकर उन्ही लहरों
से पूंछा करती किनारा का कोई पता बता दे
झिलमिलाते नीर में खुद को पहचाना करती
उठती हुई हिलोरें मग्न रहती अपनी तान में
दूर दूर तक कोई नजर ना आता
सिवाय उस क्षितिज के जो
एक होते नजर आते
पानी की तरंगों की ध्वनि
को संगीत मान हर रोज़
बस उन्हीं को सुना करती!
©anusingh
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