कुछ आसां नहीं मेरे मुहब्बत से मुकर जाना
बेहतर होता इसी रास्ते से गुजर जाना।
कब तक बैठे रहोगे तुम गुमसुम युंही
सब कुछ जाहिर कर रहा ये चहरे का उतर जाना।
वफा में लाजमी है गुस्ताखी मुकर्रर सबको।
ये तो नादानी है बस पहले इससे डर जाना।
हम फकत पकड़ते हैं शोले को शबनम समझ
दुसवारियां हैं मेरी जिने से मर जाना।
हमसुखन कुछ तो बोलो जो तुझे मुनासिब हो
अच्छा लगता नहीं तरंग-ए-समनदर का ठहर जाना।
है अदा फरमायी गयी खुदा की मेरी उलफत
घोल के अनुराग इसमें तू न जहर जाना।
©anuragrahi
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