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कुछ कहना चाहती  थी

कुछ लिखना मै तुमपर चाहती थी,
पर लिख न सकी,
कुछ कहना मैं तुमसे चाहती थी लेकिन कह न सकी...
तुम क्यों विलीन हुए ,हमे छोड पंचतत्वों मे,
तुम्हारी कमी आज भी खलती है देश के महान भक्तो मे,
अब तुम्हारा मैं क्या परिचय दु,
तूम्हे आशु कहूँ या विक्रम बत्रा या कहूँ मैं मेजर सूद, 
देश सूना कर के चले गए तुम, जबाज़ माँ के सपूत।
ऐसे मैं अंगिनत बलिदान लिखना चाहती हु लेकिन लिख न सकी,
कुछ कहना मैं तुमसे चाहती थी लेकिन कह न सकी...
कोई एक बात हो तुम में तो लिखू भी,
तुम्हारी अनेक बाते अब किस- किस से कहूँ भी,
तुम्हारे जैसे अब कहा बचे है माँ के  लाल,
जो जान गवाकर,तिरंगी में लिपटे,देश को करे सलाम,
ऐसे तिरंगो में लिपटे सभी जवानो को मैं एक बार सलाम करना चाहती थी, 
लेकिन कर न सकी,
मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी लेकिन कह न सकी ll
अब और लिखूँगी तो रो दुंगी,अपने इन अंसुवो में तुम्हे खो दुंगी,
क्यों  कोई कविता तुम्हे याद करे सिर्फ खोने पर ही?
क्यों कोई तुम्हारी बात करे सिर्फ तुम्हारे न होने पर ही?
जब जिन्दा तुझमे हजार बाते है।
येतो सब बस तुम्हारी बाते है, वरना लिखना तो मैं तुम पर  कविता चाहती थी,
लेकिन लिख न सकी,
कुछ कहना मैं तुमसे चाहती थी लेकिन कह न सकी
@ Content:Garima sharma
@Editing: Biru singh
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