वक्त न जाने क्यों ठहरा सा है...
उम्मीदों पर ना जाने क्यों पहरा सा है ....
मुकाम पर हमारे सहरा सा हैं....
घाव भीतर कुछ गहरा सा है....
लगता है चल पड़ेंगे पर भीतर की रुकावटो का सामान महंगा सा है...
देखते हैं चारों तरफ तो लगता है कोहरा सा है...
पर सामने ईश्वर की इबादत का दरिया सा है....
डूब जाए इसमें क्योंकि इसका दामन हमारे लिए ठहरा सा है...
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