कुछ तो मलाल गया कि उसने वफ़ा की
मेरे मरने के लिए रब से कुछ तो दुआ की।
दर्द ले ले कर जिने से तो है ये कहीं अच्छा
लाज रख लें हम उसके इबादत-ए-खुदा की।
हर वक्त अच्छा नहीं होता आइना देखना
कुछ तो समझा भी करो इस दिल के रज़ा की।
किसी से मुक्तसर-ए-गम की सिफारिश न कर
हर खता के लिए तू हकदार हैं सज़ा की।
रूखसत-ए-यार क्या हुआ मेरी जिन्दगी बदल गई
जल रहा हूं पश्चाताप में किए उसपे जफा की।
अनुराग तेरे जुर्म का बस है एक ही फैसला
हंसते हंसते गले लगा लो रस्सी दफा की।
©anuragrahi
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