दुसरो से जितते- जितन खुद से ही
हारे जा रहीं हूँ, ना जाने किस कि
तलाश है, मुझे मे वक्त के पिछे जा
रही हूँ, या वक्त मुझे पिछे छोड़ जा
रहा है॥
सब है, पर यैसा लगता है, कुछ खो
रहा है, उस खोये हुए को या फिर खुद
को खो रही हूँ, दुसरो से जितते- जितते
खुद से ही हारे जा रही हूँ॥
आखिर किस कि तलाश है, मुझे उस
गगन में रहने वाले ईश्वर की या इस दुनियाँ
में रहने वाले मेहमान की, कुछ तो उलझन है
जिसे मैं सुलझा रही हूँ, या फिर उस में
उलझती जा रही हूँ॥
©banirai
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