कुदरत भी क्या चीज़ है,
बनाती है, बिगाड़ती है, फिर से बनाती है।
किस्मत भी क्या चीज़ है,
मिलाती है जुदा करती है,फिर से मिलाती है।
इश्क़ भी क्या चीज़ है,
कभी होता है, कभी बहुत होता है,
कभी बेइंतहा हो जाता है।
तू भी क्या चीज़ है,
कभी पास आ जाता है,
कभी भूल सा जाता है,
कभी दूर चला जाता है।
मैं भी क्या चीज़ हूँ,
तुझे भूलती नहीं,
तुझे याद रखती हूँ,
और याद किए ही जाती हूँ।
बस ये सिलसिला यूँ ही चलता जा रहा है,
चलता रहेगा, चलता ही जाएगा।
जब तक ये धरती है, आसमान है,
तू है… और मैं हूँ।
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कुदरत भी क्या चीज़ है, बनाती है, बिगाड़ती है, फिर से बनाती है। किस्मत भी क्या…