उम्र गुज़र रही है आर्थिक बुखार में,
चलती नहीं ज़िन्दगी की ट्रेन अपनी रफ्तार में।
खोदता हूं पहाड़ तो बस निकल आती है चुहिया,
क्या करू डूबता जा रहा हूँ कर्ज और उधार में।
फर्क नहीं आने जाने का सोमवार या रविवार में,
हर दिन की है दिनचर्या सिर्फ पैसो के इंतज़ार में।
कोई सुनहला चिड़िया मेरे आँगन भी उतर आए,
आंखे बिछाए बैठा हूँ उसी के राह-ए-दीदार में।
©anuragrahi
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