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कूच-ए-यार की रात थी और मैं वहां भटक रहा

कूच-ए-यार की रात थी और मैं वहां भटक रहा

कूच-ए-यार की रात थी और वहां मैं भटक रहा

रूह उसकी थी टहल रही और मैं उसे लपक रहा

तभी सदा एक सुनाई दी कौन है दर पे बादाकश

पिट गए हम आज़ फिर आंख बहुत है फड़क रहा

कैसे कहूं कि यहां मेरा दिलनशी दिलजू एक यार है

उनके एक नज़र के खातिर दिल बहुत है बहक रहा

उनसे दोस्ती तो ख़ैर अब एक केवड़े का फुल हो

रहा तो यारों खुब रहा गया तो शाम-ए-शफ़क रहा

किस खुशी में अनुराग अब ज़ख़्म-ए-जीगर है भर गए

न यहां कोई चारासाज़ अब न कोई महक़ रहा।