क्या जिक्र करें जब ग़म जावेदानी हो
लिए उस बेवफ़ा से बदले प्यार की निशानी हो।
मेरे मरहले में विरानीयों के धुल है जमें हुए
उजाले के लिए कोई चीज़ यहां भी नुरानी हो।
क्या वक्त है कि सुख रहे शाख-ए-गुल धिरे धिरे
बचाने के लिए कुछ तो आस्मां से पानी हो।
आपकी नज़र इकतरफ़ा ही क्यूं देखती है
अपनी बात कहने को सबकों मनमानी हो।
कल शब मुझे ख्वाब में आप बांहों से लिपटे मिले
इलाज-ए-मर्ज की हर रात ऐसी सुहानी हो।
छुपाना क्या गिले-शिकवे अब हमनशी अनुराग से
कहना है वो कह दो दिल में जो भी कहानी हो।
©anuragrahi
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