कहने को तो है बहुत कुछ
पर कैसे कहूं तुझसे
गर कह भी सकूं कभी
तो क्या कहूं तुमसे....
तुम जान हो मेरी
पुराना हो गया है
दिल की धडकन हो
बचकाना बन गया है
क्या कहूं तुमसे......
फूल गजरे के लिए
लाते थे आशिक
चांदनी रातों में
सैर कराते थे आशिक
सोंचता हूं अब मैं क्या करूं
क्या कहूं तुमसे.....
चलो..अच्छा रहेगा
गर तुम बता दो
चांद तारे तोडने हों
तो योजना बता दो
मैं कहीं सोंचता हीं रह जाउं
तेरे सपने और न कोई सजाए
अब और क्या..कहूं तुमसे...
©selfmade
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