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क्या क्या नहीं है अब तेरे निशाने।

क्या क्या नहीं है अब तेरे निशाने।

क्या क्या नहीं है अब तेरे निशाने

जान बची तो है लाखों बहाने

पहला वार कर के जीगर पे

ताज़ा कर दिया वो ज़ख़्म पुराने

उफ़ न कहेंगे मक़तल पर आ कर

हम तो ऐसे हैं तेरे दिवाने

आंखों को जब तुम समझ न पाए

फिर क्या ब्यां हो नए फ़साने

दर्द-ए-दिल में अनुराग हुआ इज़ाफ़ा

रोने के फिर आ गए जमाने ।

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