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किताबो मे मिली थी सिख जो,
सुने थे कुछ लब्ज़ याद हैं।
"लड़का- लड़की अब एक हैं "
एक अब उनका अधिकार हैं।
"तुम चाहे जो बन जाओ बेटी",
तुम्हारे सपनो को अब न कोई दफनायेगा,
" तुम लड़की हो ,कायदे मे रहो"
ऐसे हुकुम अब कोई न चलाएगा!!
पर सब सब झूठ हैं, सब स्वप्न हैं,
कहने की बस यह बात हैं,
आज भी बेटियाँ दब रही,
दब रहे उनके जज़्बात हैं।
बंद कमरे सुन रहे सिसकिया,
उनके दर्द से, घर की हवाए भी उदास हैं,
फिर क्यू फैला रहे झूठ ये,
लड़का - लड़की अब समान हैं।
आज भी बहुए कैद मे हैं,
होती तानो की बौछार हैं।
सहना होता दफ़्तर मे गंदगी,
चुप रहना स्त्रित्व चरित्र की पहचान हैं।
"एक लड़का सौ चुहे खा हज़ पर जाये",
जुमले आज भी यह बरकरार हैं,
लड़कियो के लिए अकेला जीना,
असुरक्षित, मर्यादा- भंगित अपराध हैं।
पति आज भी जब जाता बेसहारा छोङ,
पत्नी के लिए एक एक पल मृत्यु समान हैं।
बेटी का त्याग, सेवा अर्थहीन,
बेटा के पिंडदान से मिलता बैकुंठ- धाम हैं।
कैसी औछी रित हैं यह,
कैसा तुक रहित ज्ञान हैं,
क्यु फैला रहे झूठ तुम,
लड़का- लड़की अब समान हैं। -2
-रितु तिवारी
©ritutiwary
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