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क्या पता.. ✍

लौगों से ज्यादा में खुद
से बातें करने लगीं हूँ,
रात में ही नहीं , पर मैं
दिन में भी सपनें देखने
लगी हूँ,
क्या सच्च है और क्या
झूठ नहीं पता, पर मैं अब
अपने सपनों में
जिने लगीं हूँ,
लौगों से ज्यादा मैं अब
खुद पर विश्वास करने लगी
हूँ,
कहाँ तक उड़ुऊगी नहींं
पता , पर अब मैं अपने पंखों
को खोलने लगी हूँ..
©banirai