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क्या था

कभी किताबों पर उसने ,
अपने नाम के साथ, मेरा नाम लिखा कर रखा था l
डेस डेस करके ना जाने क्या छुपा रखा था,
सोचता हूं अब भी जो गुजरा दिन था ,
उसमें क्या रख खा था l
ना जाने उसने हमको क्या समझ रखा था ,
पलट कर देखा जब उन दिनों को,
उसमेअपना पन रखा था l
वरसो की ख्वाहिश मैंने दबा रखा था,
गंगा के तट पर मिलने का समा रखा था l
उम्मीद की किरण को उसने तोड़ रखा था,
मिलने से पहले उसने सब खत्म कर रखा थाl
मैंने अपना प्यार अभी भी वैसा ही कर रखा था ,
कभी किताबों पर उसने ,
अपने नाम के साथ मेरा नाम लिखा रख खा था l
©sgupta