क्या उन्हें फर्क पड़ता है जिनके लिए हम मरते हैं
तसल्ली दे दे कर दिल को फकत आंहे भरते हैं।
इक बोसा तक देना नहीं समझती है जायज
छोटी है सो शायद मेरे इस उम्र से झिझकते है।
प्यार में उम्र कोई पडाव नहीं क्या बुढा क्या जवां
हम एक एक कर बारी बारी से सबके सिने से लगते हैं।
मैं अबस के बातों पर न कभी पछताता यारों
बरसात में फलक से बादल युंहीं गरजते है।
तुम्हारी रुख़सती से दिल-ए-अनुराग दहल न जाएं कहीं
चट्टान-ए-गम भितर अब हर रोज़ पिघलते है।
ब्रेकअप के बाद निकले अल्फाज़ है जो कभी किसी का गुलाम हुआ करता था।
शुक्रिया मुझे ऐसी सहर देने वाली,
शुक्रिया मुझे मिठी जहर देने वाली।
©anuragrahi
S