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क्यू मचल उठा मन तेरे आने की खुशी मे।

क्यू मचल उठा मन तेरे आने की खुशी मे।
अफसोस
की भूलकर अपना अतीत वर्तमान भविष्य
तेरे सपनो मे खोया हूँ
तू पढ़ न सकी मेरे मन को हाँ मे तेरे खतिर रोया था।
अँजाने मे नासमझी मे हर मंदिर मस्जिद भटका था।
गलती मेरी बस इतनी थी तेरी मंजूरी भी जरूरी थी।
उस के लिये हूँ क्षमारप्रार्थ और सजा भी ताउम्र तन्हाई मे बितानी है।
क्यू मचल उठा मन तेरे आने की खुशी मे।
--- हिमाँशू
©ehasas