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क्यूँ संभालूं मैं...

उनसे टूटते रिश्तों को, या उनके घर की दीवारों को,
अपने ख़ुद के गुस्से को, या उनके तेज़ इशारों को,
हर बार उनकी दहलीज़, मर्यादाओं को क्यूँ मानूं मैं,
मैं लड़की हुँ इसलिए, बिगड़ते रिश्ते क्यूँ संभालूं मैं,
ना तुम मेरी बात समझते हो, ना कभी हालात समझते हो,
मुझसे माफ़ी मांगने को तुम, एक गलत बात समझते हो,
मेरी बेड़ियां, मेरे पर्दे को तुम, घर का सम्मान बताते हो,
और मैं भी मान जाती हुँ, इसलिए मुझको दबाते हो,
क्यूं अपने पर काबू, और दूसरों का गुस्सा क्यूँ सहुँ मैं,
मैं लड़की हुँ इसलिए अपनी आवाज़ नीचे क्यूँ रखूं मैं,
हाँ मैं जानती हुँ की, अपनी भावनाओं से बहुत कमजोर हुँ मैं,
मैं जानती हुँ, एक दबी आवाज़ मगर मन का एक शोर हुँ मैं,
मेरी कमजोरिया, मेरा गुस्सा पल भर का होता है,
तुम्हारे आंगन की ही छाँव और सुनहरा भोर हुँ मैं,
फिर क्यूँ इस घने अंधेरो में खुद का वजूद तलाशु मैं,
क्यूँ, मैं लड़की हुँ इसलिए सब संभालूं मैं...!!
©priya_vish