मैं कुम्भ हुं मनोवांछित फल का,
लगा डुबकी अब तन निर्मल का।
नगण्य अपराध किए हैं तुमने,
ये मुक्ति का राह दिया है हमने।
लगा डुबकी................
लाखों का तूने दिल दुखलाया,
बच्चों से छिन लिया पिता का साया।
क्या तनिक भी नहीं था मोह माया,
अब जग गुणगान कर धर्म सनातन का।
लगा डुबकी....................
अंगुलीमार को भी अंत यही सुहाए,
ऋषि गौतम जब बता दिए उपाय।
तु तो नवमानव कर उपयोग सुबुद्धी का,
संहार कर अंत: मन निश्चर का।
लगा डुबकी.................
भौतिक सोंच बस दुख ही देगा,
शुभ कार्यों से तुम्हें दुर रखेगा।
तेरा तन तो प्रभु को अर्पण का,
पग कर पथ पर अमुल्य जिवन का।
लगा डुबकी अब तन निर्मल का।
मैं कुम्भ हुं मनोवांछित फल का।
©anuragrahi
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