खुली किताब की तरह होती है जिंदगी।
न जाने कब पलट जाते हैं तकदीर के पन्ने
फिर उन पन्नों में कैद रोती है जिंदगी
इस जिंदगी की किताब के पन्ने बहुत खास होते है क्योंकि इनमें खुशी और गम के वो अजीज़ पल रहते है।
कभी किसी पन्ने में हसती है तो कभी किसी पन्ने में रोती है जिंदगी,
खट्टे और मीठे नमकीन की तरह होती है जिंदगी।
पहले के कुछ पन्नों की तो बात निराली होती है क्योंकि उनमें बचपन की वो खास डाली होती है।
स्कूल में जाना,स्कूल से आना,
आके नहाना, फिर खेलने चले जाना।
बस यही काम होता है इन पन्नों में जिंदगी के पास,
न कोई बैर होता है और न ही कोई खास।
बीच के पन्नों में तो झूल सी जाती है जिंदगी
परेशानियों के बीच ज़िम्मेदारियों को भूल सी जाती है जिंदगी।
आखिरी के पन्नों में तो राम नाम जपना है,
यही तो समझ आता है कि कौन बैर और कौन अपना है।
अंतिम पन्नों के साथ ही खत्म हो जाती है जिंदगी ,
क्योंकि खुली किताब की तरह होती है जिंदगी।
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