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लिया क्या उसने सिला वफा का जी भर के।

लिया क्या उसने सिला वफा का जी भर के
मैंने तो होश खो दिए सुन इल्जाम सर के।
मुक्तसर उसके गुनाह नहीं होंगे जब तक
वो लौट न आए करीब एक आह भर के।
लिपट जाए गले से वो मेरे वक्त-ए-आखिर
कि फिर जिता नहीं है कोई कभी मर के।
मैंने छोड़ दिया साकी तेरा वो मयखाना
पि रहा हूं रोज़आंखों से जाम-ए-मय भर के।
क्या ख़ाक हुईं है बेहतर क़ैद से मेरी रिहाई
किया है आज़ाद मगर मेरे पर कतर के।
उठा ले जाओ अनुराग को अब दुनिया से
मिट जाएंगे खुद ब खुद झगड़े उम्र भर के।
©anuragrahi