लोग कहते है हमें ये शख्स अभी नादान है
पि रहा हूं रोज़ प्याला ज़हर का उससे क्यूं अंजान है।
हम ठहरे थे थक कर एक शजर के छांव में
उस साये को भी उड़ा के ले गई ये कैसी तुफान है।
हमने मांगा था नेक नियत से अपनों की खैरियत
ऐ खुदा मुझको उठा ले मुझपर तू बहुत मेहरबान है।
कौन होगा ऐसे सहता ये तेरे जुल्म-ओ-सितम
कर सितम जितना भी चाहे तेरे नज़र में बस यहीं इंसान हैं।
जि रहें हैं तेरे जुल्म सहकर अब बस उन्हीं के वास्ते
इसलिए मेरा ये जिना मेरे लिए बहुत आसान है।
किससे करें गिला किससे करें शिकवा अनुराग
आदमी आदमी का नहीं यहां, आदमी की यहीं पहचान है।
©anuragrahi
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