जख्म को सेहते रहना,
ना जाने क्यों आदत सी बन गई है,
किसी की गुलामी में जीने की,
ना जाने क्यों चुनौती बन गई है,
पहले गुलामी के मुगलों और अंग्रेजों की,
अब दौर चल पड़ा सरकार और उद्योगपतियों का,
नीति नियम बना कर, कर दिया मानव को यंत्र सा,
खुद के फायदे के कायदे बनाकर,
नाम दिया "लोकतंत्र" का,
कुछ नहीं गरीब, मध्यवर्ग का,
बस मर्जी अपनी चला लेते हैं,
बस सिर्फ कुर्सी पाने के लिए,
वोट बैंक अपना बना लेते हैं,
वाह रे मेरे वतन!
विश्व में "सबसे बड़े लोकतंत्र" का सम्मान पाते हैं,
गरीबी मिटाने के नाम पर,
गरीबों की जेबे खाली घर जाते हो
🌹विकास गर्ग🌹
©vikasgarg
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