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लफ़्ज-ए-रूखसत।

ख्वाहिश कि कब्र मेरी दयार-ए-यार में हो
हर रोज़ रूह को मेरे उनका दिदार हो
जिते जी तो वो मुझे अपना समझ न सकी
मेरे कब्र से ही कम से कम उनको प्यार हो।
©anuragrahi