शेष महेश गणेश दिनेश सुरेसहु जाहे निरंतर धिहआवें।
जाए अनादि अनन्त अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावें
नारद से सुख व्यास रहें पचि हारें तौ पुनि पार नाअक्चत
पावें।
पार्थ जैसे सखा को जो गीता का रसपान करावें।
जाइ देवा दी देवौ नित, नित शीष नवावें ।
तै पाईवे को मुनि जन लख लख जतन करें तौ ,
वाई पाए ना पावें ।
सब लीला करत दिखावत हे जो ताके मुख में यशुमति को साश्वत हो तीनों लोक दिखावें।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पे नाच नाचवें।
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