पहले घर को संवारा फिर मुझे सवार दिया तुमने,
चारो किनारों से लेकर छत को बसा दिया तुमने,
हर एक कदम जो मैंने चलना सीखा तेरी ही तो छाया है इनमें,
संस्कार की बातें, जिंदगी के वो सच तुमने ही तो सिखाया हर वक़्त,
मै कभी खाली पेट नहीं सोया लेकिन तेरी थाली में दो रोटियां कम देखी है मैंने,
अपने सपनों कि हत्या की, पर सारे कर्तव्य निभाएं है तुमने।
मेरी गलतियों से सीखना , मुसीबतों से ना घबराना तेरी ही तो वाणी हैं ये।
तेरे हाथ जब जब मेरे सिर पर पड़े सुकून सा पाया मैंने।
कभी मै जिंदगी में संभला हूं तो तेरी ही मेहनत है, ये तेरा ही त्याग है।
आज वो चांद,वो सूरज क्या है तेरे सामने, आखिर रोशनी तूने ही तो लाई है मेरी जिंदगी में।।
©sochamit
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