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" मां "( अथाह स्वरूप से सूक्ष्म वर्णन )

मां वो खुली किताब है....
जिसके पन्ने अनादि काल है....
जीवन में उनके ईश्वर का तदाकार है.....
कुछ पन्नों में उनके हमारा उदगम द्वार है ,
जिसमें हमें पोषित करता उनके दामन का गुणगान है...
दबी ख्वाहिशों का भीतर में उनके भंडार है...
मुस्कुराता हमारा चेहरा ही उनका उपहार है.....
पन्नों में उनके दयालुता का वर्णित सार है.......
उनका स्वरूप इस दुनिया के लिए चमत्कार है......
कुछ पन्नों में संघर्षों की लंबी कतार है......
मुस्कुराहट ही उनकी ईश्वर का प्रसाद है.....
बुनते हैं आज हम इन शब्दों को ,
पर इन शब्दों को देने में उस मां का ही उपकार है.||
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