V

माँ -बाप की खातिर

परवाह नही चाहे कहता रहे
कोई भी हमे पागल दीवाना,
हम क्यूँ बतायें किसी को
कि जानते है हम गमों में भी मुस्काना,
लुटानी पडती है जान, इश्क में
यूँ ही नही लिखते मोहब्बत का अफसाना,
लाश के पास खड़ी होती है साँस लेती लाशें,
मुर्दा कौन है, समझे तो मुझे भी समझाना,
बहाने बना देते है अपने जरूरी कामों के,
पर मौत सुनती नही किसी का कोई भी बहाना,
नूर ना हो जाये इक इक बूंद अश्क की तो कहना,
कभी माँ -बाप की खातिर चंद आंसू तो बरसाना,
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©vikasgarg