मां की पुकार जो करता है स्वीकार
चल पड़ते हैं उसके कदम उनके दरबार
मन के दरवाजों पर होता है शांति का सार
घंटी के कंपन्नो की चलती है कतार
मधुर महक का होता है भीतर मे संचार
आंखों में मासूमियत की भरती है धार
मुरत करती है उनकी हमें शीतलता से तार
समय के बहाव को भूल जाते हैं ,
जब पहुंचते हैं उनके द्वार
उनके मुख की मुस्कान का करते हैं दीदार
उनकी उपस्थिति के भाव की,
करते हैं भीतर मे भरमार
और फिर चल पड़ते हैं
होते हैं सुकून की कश्तियों का सवार
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