वस्तु सा तन
जिससे चल रहा है जीवन का रण
हर क्षण हो रहा है क्षरण
संभालने में लगे हैं मिथ्या भौतिक जगत को
और कर रहे हैं वास्तविक मूल्य का हरण
जिसकी अंतिम परिपाटी है मरण ही मरण
लेना हैं ईश्वरीय आभासों को पाने का प्रण
क्योंकि ईश्वर ही है जगत के लोगों में एक मात्र स्वर्ण
इस प्रक्रिया में ना समझ है ब्रह्मांड का मानवीय कण
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